YouTube वीडियो देखकर प्रभावित होती हैं हमारी भावनाएं, Video मेकर जैसा सोचने लगते हैं यूजर्स


* स्टडी के मुताबिक, हमारी जैसी भावनाएं होती हैं,हम वैसा ही कंटेंट ऑनलाइन ढूंढते हैं
गैजेट. अक्सर सुनने में आता है कि हम जैसा देखते हैं, वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं। अब एक रिसर्च स्टडी में भी यह बात साबित हो गई है। नीदरलैंड की टीलबर्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने अपनी स्टडी में पाया कि अपने वीडियो में यूट्यूबर (व्लॉगर)जिस तरह की भावनाएं व्यक्त करता है, उसी तरह की भावनाएं इसे देखने वाले भी व्यक्त करते हैं। इसके लिए रिसर्चर ने 10 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर वाले यूट्यूब चैनल और उनके वीडियो पर किए गए कमेंट्स का एनालिसिस किया। इस स्टडी को सोशल साइकोलॉजिकल एंड पर्सनैलिटी साइंस में प्रकाशित किया गया है।
भावनाएं ऑनलाइन एक्टिविटी पर निर्भर
रिसर्चर की स्टडी में सामने आया कि हमारा मूड हमारी ऑनलाइन एक्टिविटी पर निर्भर करता है। इस स्टडी के लीड ऑथर हैन्स रोजनबश ने बताया, अगर हम इंटरनेट पर किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं, जो बहुत ज्यादा खुश या निराश रहता है तो हमारा मूड भी उसी तरह हो जाता है। वास्तव में हम इंटरनेट पर उन लोगों को ज्यादा खोजते हैं जो हमारे जैसी भावनाओं को व्यक्त करते हैं या फिर हम जो ऑनलाइन देखते हैं, उसी तरह भावनाएं व्यक्त करते हैं।
रोजनबश ने बताया, हमारा सामाजिक जीवन भले ही ऑनलाइन हो सकता है, लेकिन हमारी भावनाएं या जिस तरह से हम एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं, वो हमेशा साइकोलॉजिकल प्रोसेस से ही चलेगा।
 वीडियो का असर लंबे समय तक रहता है
यूट्यूब पर पोस्ट वीडियो और कमेंट्स का एनालिसिस करने के बाद रिसर्चर ने पाया कि इन वीडियो को देखने वालों पर इसका प्रभाव तुरंत भी होता है और लंबे समय तक रहता है। मसलन,अगर यूट्यूबर ने अपना वीडियो पॉजिटिव टोन के साथ पोस्ट किया है, तो उस पर आने वाले कमेंट भी पॉजिटिव ही रहते हैं और ऐसा ही निगेटिव टोन वीडियो के साथ भी होता है।
* रिसर्चर ने पाया कि ज्यादातर लोग उन वीडियो को देखना पसंद करते हैं, जिनमें उनकी ही तरह भावनाएं होती हैं। जैसे- अगर किसी व्यक्ति का मूड पॉजिटिव है तो वो पॉजिटिव भावनाओं वाला वीडियो देखना पसंद करेगा।
छह साल पहले विवादों में रही थी ऐसी स्टडी
* इससे पहले 2015 में भी एक स्टडी हुई थी, जिसमें पाया गया था कि व्यक्ति का व्यवहार जैसा होता है, वो उसी तरह की ऑनलाइन एक्टिविटी करता है। 2015 में हुई स्टडी में कहा गया था कि जिन ट्विटर यूजर्स की फीड पॉजिटिव होती है, वो पॉजिटिव ट्वीट करते हैं जबकि जिन यूजर्स की फीड निगेटिव होती है, वे निगेटिव ट्वीट करते हैं।
इससे पहले फेसबुक 2012 में उस वक्त विवादों में आ गया था, जब उसने भावनात्मक लगाव जानने के लिए डेटा साइंटिस्ट की मदद से लगभग 70 हजार यूजर्स की फीड में हेरफेर कर दिया था। इससे पता चला था कि जिन यूजर्स की फीड में हेरफेर या बदलाव हुआ था, उससे उनकी भावनाएं प्रभावित हुई थीं।

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