गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे अहमद पटेल, पायलट को जितेंद्र ने मनाया
अशोक गहलोत और सचिन पायलट।
पटेल के अलावा आनंद शर्मा और मुकुल वासनिक ने सोनिया को मैसेज भेजा कि लोकसभा चुनाव में गहलोत ज्यादा असरदार होंगे
सचिन का तर्क था- जब मध्यप्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष (कमलनाथ) को सीएम बनाया जा सकता है तो राजस्थान में -क्यों नहीं?
गहलोत ने कहा था कि अगर उन्हें सीएम नहीं बनाया गया तो लोकसभा चुनाव में जातीय समीकरण बिगड़ सकते हैं
जयपुर (प्रेमप्रताप सिंह). राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर तीन दिन तक जयपुर से लेकर दिल्ली तक पॉलिटिकल ड्रामा चलता रहा। पहले गहलोत और सचिन पायलट को दिल्ली बुलाया गया। फिर दिल्ली से जयपुर जाते वक्त दोनों को एयरपोर्ट से लौटने के लिए कहा गया। अगले ही दिन गुरुवार सुबह फिर दिल्ली बुला लिया गया। बैठकों का दौर शुरू हुआ। गहलोत को सीएम बनाकर दो बार एयरपोर्ट के लिए रवाना कर दिया गया। दोनों ही बार वापस बुला लिया गया। इस ड्रामे में किस किरदार ने किस-किस तरह की भूमिका निभाई, इसका कैसे अंत हुआ, पढ़िए तीन दिन तक चले घटनाक्रम की अंदर की पूरी कहानी……
अहमद पटेल
गहलोत को सीएम बनाने की पटकथा लिखी : गहलोत को सीएम बनाने के लिए कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल की ओर से पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। पटेल सोनिया के राजनीतिक सलाहकार रह चुके हैं, जिन्होंने गहलोत को सीएम बनाने के लिए सोनिया और प्रियंका को राजी कर लिया था। फिर इन दोनों ने राहुल को मनाया।
फेवर रिटर्न किया : पटेल की गहलोत ने तब मदद की थी, जब गुजरात में पटेल राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ रहे थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सीधे तौर पर पटेल को चुनौती दे रहे थे, तब संकट से उबारने का काम गुजरात प्रभारी के तौर पर अशोक गहलोत ने किया था।
जितेंद्र सिंह
पायलट को डिप्टी सीएम बनने के लिए राजी किया : मुख्यमंत्री पद से नीचे ना तो अशोक गहलोत और ना ही सचिन पायलट मानने को तैयार थे। ऐसा लग रहा था कि विवाद खत्म नहीं होगा। पार्टी में तनाव चरम पर पहुंच रहा था। उस समय राहुल गांधी के लिए संकट मोचक के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भूमिका निभाई। यूं तो पायलट को पहले भी डिप्टी सीएम पद का ऑफर दिया गया, लेकिन पायलट ने इसे स्वीकार नहीं किया था।
बाद में जितेंद्र सिंह सचिन पायलट को डिप्टी सीएम के पद पर मनाने में कामयाब रहे। शुक्रवार को जितेंद्र और सचिन पायलट की मुलाकात हुई। सहमति बनाने के बाद ये दोनों राहुल गांधी से मिले। इस दौरान अशोक गहलोत भी मौजूद रहे। चारों की उपस्थिति में सीएम और डिप्टी सीएम पर सहमति बनने के बाद इस ड्रामे का अंत हो गया।
सियासत की यह पूरी गणित पिछले तीन दिनों तक दिल्ली और जयपुर के बीच घूमती रही। दिल्ली में राहुल का आवास प्रमुख केन्द्र बना रहा।
सचिन पायलट
तर्क-गहलोत काे चाहत थी तो अध्यक्ष भी बनते: पायलट ने राहुल के आगे तर्क रखा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में नतीजे देने की बात है तो गहलोत 1998 में सीएम बनने के बाद 2003 में पार्टी को नहीं जिता पाए। 2008 में सीएम बनने के बाद 2013 में पार्टी हारी। 21 सीटों पर आ गई। गहलोत तब प्रदेश अध्यक्ष क्यों नहीं बने?
कास्ट फैक्टर से खुद को अलग किया : पायलट ने राहुल को स्पष्ट किया था कि मैं जाति विशेष की राजनीति नहीं करता। ऐसे में मुझे एक जाति का नेता क्यों बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश में जाति मायने रखती है, वहां कमलनाथ को क्यों चुना गया।
अशोक गहलोत
आलाकमान को दूसरे राज्यों में काम गिनाए : गहलोत पहले दिन से ही पूरी तरह कॉन्फिडेंट थे। सीएम पद के लिए उनकी ओर से काफी पहले से ही भूमिका तैयार कर ली गई थी। बेशक प्रदेश में काम नहीं कर रहे थे, लेकिन उन्होंने गुजरात, कर्नाटक और अन्य दूसरे राज्यों में अपने द्वारा किए गए कामों को आलाकमान के आगे गिनाया।
डिसीजन मुश्किल बना दिया : गहलोत ने तर्क रखा जब देश में मोदी लहर थी, उस समय मोदी के गृह राज्य गुजरात में पहुंचकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का काम किया। तर्क दिया गया कि इस भूमिका को कैसे कम आंका जा सकता है। इससे फैसला मुश्किल हो गया।

Comments
Post a Comment